"Anant Koti Brahmand Nayak Raja Dhiraj Yogi Raj Par Brahm Shri Satchidananda Sadguru Sai Nath Maharaj Ki Jai."

sai baba darshan

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"काशीराम" बाबा का भक्त, इस शिर्डी में रहता था ।

मैं साईं का साईं मेरा, वह दुनिया से कहता था ॥

सीकर स्वयं वस्त्र बेचता, ग्राम नगर बाजारों में ।

झंकृत उसकी हृद तन्त्री थी, साईं की झंकारों में ॥

स्तब्ध निशा थी, थे सोये, रजनी आंचल में चांद-सितारे ।

नहीं सूझता रहा हाथ को हाथ तिमिर के मारे ॥

वस्त्र बेचकर लौट रहा था, हाय! हाट से "काशी" ।

विचित्र बड़ा संयोग कि उस दिन, आता था वह एकाकी ॥

घेर राह में खड़े हो गए, उसे कुटिल, अन्यायी ।

मारो काटो लूटो इस की ही ध्वनि पड़ी सुनाई ॥

लूट पीट कर उसे वहां से, कुटिल गये चम्पत हो ।

आघातों से ,मर्माहत हो, उसने दी संज्ञा खो ॥

बहुत देर तक पड़ा रहा वह, वहीं उसी हालत में ।

जाने कब कुछ होश हो उठा, उसको किसी पलक में ॥

अनजाने ही उसके मुंह से, निकल पड़ा था साईं ।

जिसकी प्रतिध्वनि शिर्डी में, बाबा को पड़ी सुनाई ॥

क्षुब्ध उठा हो मानस उनका, बाबा गए विकल हो ।

लगता जैसे घटना सारी, घटी उन्हीं के सम्मुख हो ॥

उन्मादी से इधर-उधर, तब बाबा लगे भटकने ।

सम्मुख चीजें जो भी आईं, उनको लगे पटकने ॥

और धधकते अंगारों में, बाबा ने अपना कर डाला ।

हुए सशंकित सभी वहां, लख ताण्डव नृत्य निराला ॥

समझ गए सब लोग कि कोई, भक्त पड़ा संकट में ।

क्षुभित खड़े थे सभी वहां पर, पड़े हुए विस्मय में ॥

उसे बचाने के ही खातिर, बाबा आज विकल हैं ।

उसकी ही पीड़ा से पीड़ित, उनका अन्त:स्थल है ॥

इतने में ही विधि ने अपनी, विचित्रता दिखलाई ।

लख कर जिसको जनता की, श्रद्धा-सरिता लहराई ॥

लेकर कर संज्ञाहीन भक्त को, गाड़ी एक वहां आई ।

सम्मुख अपने देख भक्त को, साईं की आंखें भर आईं ॥

शान्त, धीर, गम्भीर सिन्धु-सा, बाबा का अन्त:स्थल ।

आज न जाने क्यों रह-रह कर, हो जाता था चंचल ॥

आज दया की मूर्ति स्वयं था, बना हुआ उपचारी ।

और भक्त के लिए आज था, देव बना प्रतिहारी ॥51॥

आज भक्ति की विषम परीक्षा में, सफल हुआ था “काशी” ।

उसके ही दर्शन के खातिर, थे उमड़े नगर-निवासी ॥

जब भी और जहां भी कोई, भक्त पड़े संकट में ।

उसकी रक्षा करने बाबा, आते हैं पलभर में ॥

युग-युग का है सत्य यह, नहीं कोई नई कहानी ।

आपातग्रस्त भक्त जब होता, आते खुद अन्तर्यामी ॥

भेद-भाव से परे पुजारी, मानवता के थे साईं ।

जितने प्यारे हिन्दु-मुस्लिम, उतने ही थे सिक्ख ईसाई ॥

भेद-भाव मन्दिर-मस्जिद का, तोड़-फोड़ बाबा ने डाला ।

राम-रहीम सभी उनके थे, कृष्ण-करीम-अल्लाहताला ॥

घण्टे की प्रतिध्वनि से गूंजा, मस्जिद का कोना-कोना ।

मिले परस्पर हिन्दू-मुस्लिम, प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना ॥

चमत्कार था कितना सुंदर, परिचय इस काया ने दी ।

और नीम कडुवाहट में भी, मिठास बाबा ने भर दी ॥

सबको स्नेह दिया साईं ने, सबको सन्तुल प्यार किया ।

जो कुछ जिसने भी चाहा, बाबा ने उनको वही दिया ॥

ऐसे स्नेह शील भाजन का, नाम सदा जो जपा करे ।

पर्वत जैसा दु:ख न क्यों हो, पलभर में वह दूर टरे ॥

साईं जैसा दाता हमने, अरे नहीं देखा कोई ।

जिसके केवल दर्शन से ही, सारी विपदा दूर हो गई ॥

तन में साईं, मन में साईं, साईं-साईं भजा करो ।

अपने तन की सुधि-बुधि खोकर, सुधि उसकी तुम किया करो ॥

जब तू अपनी सुधि तज, बाबा की सुधि किया करेगा ।

और रात-दिन बाबा, बाबा ही तू रटा करेगा ॥

तो बाबा को अरे! विवश हो, सुधि तेरी लेनी ही होगी ।

तेरी हर इच्छा बाबा को, पूरी ही करनी होगी ॥

जंगल-जंगल भटक न पागल, और ढूंढ़ने बाबा को ।

एक जगह केवल शिर्डी में, तू पायेगा बाबा को ॥

धन्य जगत में प्राणी है वह, जिसने बाबा को पाया ।

दु:ख में सुख में प्रहर आठ हो, साईं का ही गुण गाया ॥

गिरें संकटों के पर्वत, चाहे बिजली ही टूट पड़े ।

साईं का ले नाम सदा तुम, सम्मुख सब के रहो अड़े ॥

इस बूढ़े की करामात सुन, तुम हो जाओगे हैरान ।

दंग रह गये सुनकर जिसको, जाने कितने चतुर सुजान ॥

एक बार शिर्डी में साधू, ढ़ोंगी था कोई आया ।

भोली-भाली नगर-निवासी, जनता को था भरमाया ॥

जड़ी-बूटियां उन्हें दिखाकर, करने लगा वहां भाषण ।

कहने लगा सुनो श्रोतागण, घर मेरा है वृन्दावन ॥

औषधि मेरे पास एक है, और अजब इसमें शक्ति ।

इसके सेवन करने से ही, हो जाती दु:ख से मुक्ति ॥

अगर मुक्त होना चाहो तुम, संकट से बीमारी से ।

तो है मेरा नम्र निवेदन, हर नर से हर नारी से ॥

लो खरीद तुम इसको इसकी, सेवन विधियां हैं न्यारी ।

यद्यपि तुच्छ वस्तु है यह, गुण उसके हैं अति भारी ॥

जो है संतति हीन यहां यदि, मेरी औषधि को खायें ।

पुत्र-रत्न हो प्राप्त, अरे वह मुंह मांगा फल पायें ॥

औषधि मेरी जो न खरीदे, जीवन भर पछतायेगा ।

मुझ जैसा प्राणी शायद ही, अरे यहां आ पायेगा ॥

दुनियां दो दिन का मेला है, मौज शौक तुम भी कर लो ।

गर इससे मिलता है, सब कुछ, तुम भी इसको ले लो ॥

हैरानी बढ़ती जनता की, लख इसकी कारस्तानी ।

प्रमुदित वह भी मन ही मन था, लख लोगो की नादानी ॥

खबर सुनाने बाबा को यह, गया दौड़कर सेवक एक ।

सुनकर भृकुटि तनी और, विस्मरण हो गया सभी विवेक ॥

हुक्म दिया सेवक को, सत्वर पकड़ दुष्ट को लाओ ।

या शिर्डी की सीमा से, कपटी को दूर भगाओ ॥

मेरे रहते भोली-भाली, शिर्डी की जनता को ।

कौन नीच ऐसा जो, साहस करता है छलने को ॥

पल भर में ही ऐसे ढ़ोंगी, कपटी नीच लुटेरे को ।

महानाश के महागर्त में, पहुंचा दूं जीवन भर को ॥

तनिक मिला आभास मदारी क्रूर कुटिल अन्यायी को ।

काल नाचता है अब सिर पर, गुस्सा आया साईं को ॥

पल भर में सब खेल बन्द कर, भागा सिर पर रखकर पैर ।

सोच था मन ही मन, भगवान नहीं है अब खैर ॥

सच है साईं जैसा दानी, मिल न सकेगा जग में ।

अंश ईश का साईंबाबा, उन्हें न कुछ भी मुश्किल जग में ॥

स्नेह, शील, सौजन्य आदि का, आभूषण धारण कर ।

बढ़ता इस दुनिया में जो भी, मानव-सेवा के पथ पर ॥

वही जीत लेता है जगती के, जन-जन का अन्त:स्थल ।

उसकी एक उदासी ही जग को कर देती है विह्वल ॥

जब-जब जग में भार पाप का, बढ़ बढ़ ही जाता है ।

उसे मिटाने के ही खातिर, अवतारी ही आता है ॥

पाप और अन्याय सभी कुछ, इस जगती का हर के ।

दूर भगा देता दुनिया के, दानव को क्षण भर में ॥

स्नेह सुधा की धार बरसने, लगती है इस दुनिया में ।

गले परस्पर मिलने लगते, हैं जन-जन आपस में ॥

ऐसे ही अवतारी साईं, मृत्युलोक में आकर ।

समता का यह पाठ पढ़ाया, सबको अपना आप मिटाकर ॥

नाम द्वारका मस्जिद का, रक्खा शिर्डी में साईं ने ।

दाप, ताप, सन्ताप मिटाया, जो कुछ आया साईं ने ॥

सदा याद में मस्त राम की, बैठे रहते थे साईं ।

पहर आठ ही राम नाम का, भजते रहते थे साईं ॥

सूखी-रूखी, ताजी-बासी, चाहे या होवे पकवान ।

सदा प्यार के भूखे साईं की, खातिर थे सभी समान ॥

स्नेह और श्रद्धा से अपनी, जन जो कुछ दे जाते थे ।

बड़े चाव से उस भोजन को, बाबा पावन करते थे ॥

कभी-कभी मन बहलाने को, बाबा बाग में जाते थे ।

प्रमुदित मन निरख प्रकृति, छटा को वे होते थे ॥

रंग-बिरंगे पुष्प बाग के, मन्द-मन्द हिल-डुल करके ।

बीहड़ वीराने मन में भी, स्नेह सलिल भर जाते थे ॥

ऐसी सुमधुर बेला में भी, दु:ख आपात विपदा के मारे ।

अपने मन की व्यथा सुनाने, जन रहते बाबा को घेरे ॥

सुनकर जिनकी करूण कथा को, नयन कमल भर आते थे ।

दे विभूति हर व्यथा,शान्ति, उनके उर में भर देते थे ॥

जाने क्या अद्भुत,शक्ति, उस विभूति में होती थी ।

जो धारण करते मस्तक पर, दु:ख सारा हर लेती थी ॥

धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन, जो बाबा साईं के पाये ।

धन्य कमल-कर उनके जिनसे, चरण-कमल वे परसाये ॥

काश निर्भय तुमको भी, साक्षात साईं मिल जाता ।

बरसों से उजड़ा चमन अपना, फिर से आज खिल जाता ॥

गर पकड़ता मैं चरण श्री के, नहीं छोड़ता उम्रभर ।

मना लेता मैं जरूर उनको, गर रूठते साईं मुझ पर ॥

समाप्त